तर्क (Reasoning)

तर्क (Reasoning)

तर्क(Reasoning)-तर्क वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी समस्या को हल करने के लिए वर्तमान में हुई घटनाओं या परिस्थितियों का निरीक्षण करके एक हल (निष्कर्ष) निकालने का प्रयास किया जाता है।
गेट्स व अन्य के अनुसार, ”तर्क फलदायक या उत्पादक चिन्तन है जिसमें किसी समस्या का समाधान करने के लिए पूर्वानुभवों को नवीन रूप और तरीकों से पुनः संगठित या सम्मिलित किया जाता है।”
तर्क के सोपान (Steps in Reasoning)- जॉन डीवी के अनुसार तर्क के पाँच सोपान होते हैं-
(1) समस्या की उपस्थिति।
(2) समस्या के विषय में जानकारी।
(3) समस्या समाधान के उपाय।
(4) एक उपाय का चुनाव ।
(5) उस उपाय का उपयोग।
तर्क के प्रकार (Types of Reasoning)- तर्क दो प्रकार का होता है-
(1) आगमन तर्क (Inductive Reasoning)- इस तर्क में व्यक्ति अपने अनुभवों या अपने द्वारा संकलित तथ्यों के आधार पर किसी सामान्य सिद्धान्त या नियम का प्रतिपादन करता है।
(2) निगमन तर्क (Deductive Reasoning)- इस प्रकार के तर्क में व्यक्ति पूर्व निश्चित सिद्धान्तों अथवा नियमों के आधार पर किसी परिस्थिति या वस्तु-विशेष की सत्यता को प्रमाणित करता है।
मूल प्रवृत्ति
मूल प्रवृत्ति- मूल प्रवृत्ति वह जन्मजात और स्वाभाविक शक्तियाँ है जो प्राणीमात्र के व्यवहार को परिचालित करती हैं. मूल प्रवृत्तियों कहलाती है।
मूल प्रवृत्तियों का सम्बन्ध संवेगों से होता है, प्रत्येक मूल प्रवृत्ति किसी न किसी संवेग से सम्बन्धित होती है।
मैक्डूगल ने 14 मूल प्रवृत्तियों के बारे में बताया है जिनका किसी न किसी संवेग से सम्बन्ध होता है।
मूल प्रवृत्ति                                   सम्बन्धित  संवेग
1. भागना                                            भय
2 .युद्ध-प्रवृत्ति                                     क्रोध
3. अप्रियता/विकर्षण                          घृणा
4. पैतृक प्रवृत्ति                                   वात्सल्य
5. संवेदना                                          करुणा
6. जिज्ञासा                                          आश्चर्य
7. काम                                              कामुकता
8. आत्म-प्रकाशन                               आत्म अभिमान
9. विनीत भाव                                    आत्म हीनता
10. समूह प्रवृत्ति                                 एकाकीपन
11. भोजनान्वेषण                                भूख
12. संग्रह या संचय                             अधिकार भावना
13. रचना                                           कृति भाव
14 .हास्य                                           आमोद
 
प्रमुख कथन एवं परिभाषायें-
1. सारेन्सन के अनुसार, नवजात शिशु का शरीर तब तक अभिवृद्धि तथा विकास करता है जब तक एक वयस्क शरीर नहीं हो जाता है।
2.जब बालक 6 वर्ष का हो जाता है तो उसकी मानसिक योग्यताओं का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है।-
क्रो एण्ड क्रो
3.जन्म के समय शिशु न तो सामाजिक प्राणी होता है और न असामाजिक पर वह इस स्थिति में बहुत
समय तक नहीं रहता है। -क्रो एण्ड क्रो
4. संवेगात्मक एवं सामाजिक व्यवहार साथ-साथ चलते हैं-क्रो एण्ड क्रो
5. मानसिक विकास 15 से 20 वर्ष की आयु में अपनी उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है। –वुडवर्थ
6. संवेग व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था है। –वुडवर्थ
7. संवेग, चेतना की वह अवस्था है जिसमें रागात्मक तत्व की प्रधानता रहती है-रॉस
8. चिंतन, मानसिक क्रिया का ज्ञानात्मक पहलू है। –रॉस
9. सृजनात्मकता, मुख्यतः नवीन रचना या उत्पादन होती है –जेम्सड्रेवर
10. कल्पना वह शक्ति है, जिसके द्वारा हम अपनी प्रतिभाओं का नये रूप से प्रयोग करते हैं। –रायबर्न

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