प्रगतिशील शिक्षा

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बाल-केन्द्रित शिक्षा व प्रगतिशील शिक्षा

बाल-केन्द्रित शिक्षा के विषय में मुख्य रूप से राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 में विवरण मिलता है। हालांकि प्रकृतिवादियों के
समय से बाल-केन्द्रित व क्रिया-केन्द्रित शिक्षा की बात की जाती रही है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 और प्रोग्राम ऑफ एक्शन, 1992 ने 14 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों का सार्वभौमिक नामांकन तथा सार्वभौमिक रूप से उन्हें स्कूल में टिकाए रखने तथा स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में ठोस सुधार के लिए बाल-केन्द्रित उपागम का विचार प्रस्तुत किया था।

समाज में मिलने वाली अनौपचारिक शिक्षा, विद्यार्थी में अपना ज्ञान स्वयं सृजित करने की स्वाभाविक क्षमता को विकसित करती है जिससे विद्यार्थी में अपने आस-पास के सामाजिक व भौतिक वातावरण से और विभिन्न कार्यों से जुड़ने की क्षमता बढ़ती है।

बाल-केन्द्रित शिक्षा का अर्थ बच्चों के अनुभवों, उनके स्वरों और उनकी सक्रिय सहभागिता को प्राथमिकता मनोवैज्ञानिक विकास व अभिरुचियों के मद्देनजर शिक्षा को नियोजित करने की आवश्यकता होती है। इसलिए शिक्षा की योजना इस प्रकार हो कि वह विशेषताओं व जरूरतों की विशाल विविधताओं के तहत भौतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक प्राथमिकताओं को सम्बोधित करें।

अधिकांशतः स्कूलों के शैक्षिक अभ्यास, सिखाने के कार्य और विद्यार्थियों के लिए बनाई गई पुस्तकें, उनके समाजीकरण और उनके सीखने में ग्रहणशीलता के गुण पर बल दिया जाता है। जबकि हमें उनकी सक्रियता व रचनात्मक सामर्थ्य को पोषित और संवर्द्धित करना चाहिए और दुनिया से वास्तविक तरीकों से सम्बन्ध बैठाने, दूसरों से जुड़ने की उनकी मूल अभिरुचि या अर्थ ढूँढ़ने की जन्मजात रुचि को पोषित करना चाहिए।

इस प्रकार बाल-केन्द्रित व प्रगतिशील शिक्षा के उद्देश्य एक जैसे ही हैं।

प्रगतिशील शिक्षा संगठन, जिसकी स्थापना स्टैनवुड कोव (Stanwood Cobb) व अन्य ने की थी, इन्होंने 1919 से 1955 तक शिक्षा में बाल केन्द्रित उपागम को प्रोत्साहित करने के लिए कार्य किया, आठ सालों तक प्रगतिशील कार्यक्रमों को चलाकर उनका मूल्यांकन किया गया। 1500 छात्रों का, चार साल से भी ज्यादा समय तक, परम्परागत विद्यालयों से पढ़ने वाले छात्रों से तुलना की गई और परिणामस्वरूप वे बेहतर पाये गये।

प्रगतिशील शिक्षा व बाल- केन्द्रित शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं-

1.करके सीखने पर बलः छात्र स्वयं अपने हाथों से करके सीखें, विभिन्न योजनाएँ व अधिगम अनुभव द्वारा सीखें।

2.समस्या समाधान व आलोचनात्मक चिन्तन पर बलः छात्र समस्या समाधान की दिशा में प्रेरित हो, वह खुद विभिन्न
प्रकार से चिन्तन करके अपनी समस्याओं का हल ढूँढ़े।

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3. सामूहिक कार्य व सामाजिक कुशलता पर बल : बालक विभिन्न सामूहिक कार्यों में व्यस्त रहें व विभिन्न सामाजिक
कौशलों का ज्ञान प्राप्त करें।

4. सामाजिक दायित्व व प्रेजातंत्र के लिए शिक्षा : बालक शिक्षा प्राप्त कर सामाजिक दायित्व की पूर्ति करने योग्य हो।

5.जीवन-पर्यन्त अधिगम व सामाजिक कौशलों पर बल : अधिगम अनुभव सम्पूर्ण जीवन प्राप्त होते रहें व सामाजिक
कौशलों की शिक्षा पर बल दें।

6.भावी समाज में आवश्यक कुशलता को ध्यान में रखकर विषय-वस्तु का चयन : भविष्य में समाज में जिन
कौशलों की आवश्यकता है, उनको ध्यान में रखकर ही पाठ्य-सामग्री का चयन हो।

7. सहयोगी अधिगम योजनाएँ : अधिगम योजनाएँ हों, जिन्हें पूर्ण करने में आपसी सहयोग की आवश्यकता हो।

8.पाठ्यचर्या अधिक लचीली व छात्र रुचि के अनुभव : पाठ्यचर्या में लचीलापन व विविधता हो। वह छात्रों की रुचि के अनुसार हो।

9. खोजपूर्ण विधि से अधिगम : अध्यापक बालकों को खोजपूर्ण विधि से सीखने हेतु प्रेरित करें।

10. क्रिया की प्रधानता : अध्यापक ऐसे अधिगम को प्रेरित करें जिसमें बहुविध क्रियाओं द्वारा अधिगम हों।

वैयक्तिक विभिन्नताएँ (Individual Difference)

वैयक्तिक विभिन्नता प्रकृति का स्वाभाविक गुण व देन है। सामान्यत: सभी व्यक्ति समान दिखाई देते हैं, किन्तु सूक्ष्म रूप से देखने पर ज्ञात होता है कि उनमें परस्पर अन्तर आवश्यक है। एक ही माता-पिता की संतानें भी शारीरिक बनावट, मानसिक योग्यताओं तथा व्यक्तित्व के गुणों आदि में समान नहीं दिखाई देतीं।

वैयक्तिक विभिन्नता का मुख्य कारण वंशानुक्रम व वातावरण है। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेषताएँ होती हैं, जो उसे दूसरे व्यक्ति से अलग करती हैं। वंशानुक्रम का अध्ययन करते समय, 19वीं शताब्दी में सर फ्रांसिस गाल्टन का ध्यान वंशानुक्रम की ओर गया। 20वीं शताब्दी में, पियर्सन, कैटेल व रिमैन आदि मनोवैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन किया। फलस्वरूप वैयक्तिक विभिन्नता को जानकर, शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा की योजना, उपयुक्त उपयोगी शिक्षा प्रणालियों व सिद्धान्तों का निर्माण किया। स्किनर ने कहा- “बालक की प्रत्येक सम्भावना के विकास का एक विशिष्ट काल होता है। यह विशिष्ट काल वैयक्तिक भेद के अनुसार प्रत्येक में भिन्न-भिन्न होता है, यदि उचित समय पर इस सम्भावना को विकसित करने का प्रयत्न न किया जाए, तो उसके नष्ट होने का भय रहता है।”

अर्थ व परिभाषाएँ:

कार्टर बी. गुड द्वारा रचित ‘Dictionary of Education’ के अनुसार-
(i) व्यक्तियों में किसी एक विशेषता या अनेक विशेषताओं को लेकर पाये जाने वाला अन्तर।
(ii) अपने सम्पूर्ण में वे सारे भेद अन्तर, जो एक व्यक्ति को दूसरे से अलग करते हैं।

टायलर के अनुसार, “शरीर के रूप-रंग, आकार, कार्य, बुद्धि, गति, ज्ञान, उपलब्धि, रुचि, अभिरुचि आदि लक्षणों
में पायी जाने वाली विभिन्नता को वैयक्तिक विभिन्नता कहते हैं।”
अतः स्पष्ट है कि वैयक्तिक विभिन्नता उन सभी क्षमताओं तथा लक्षणों आदि से सम्बन्धित है जिनसे व्यक्तित्व का विकास व निर्माण होता है।

वैयक्तिक विभिन्नता के आधार

1. वंशानुक्रम : माता-पिता व अन्य पूर्वजों से संतान को प्राप्त होने वाला गुण। इन्हीं के कारण प्रत्येक मनुष्य में विभिन्नता और समानता भी दिखाई देती है।

2. पर्यावरण : मानव विकास में पर्यावरण का स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण है। पर्यावरण में वे सभी तत्त्व आते हैं जो मानव विकास व उसके सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं, पर्यावरण का अर्थ व्यापक है। इसके प्रभाव से ही वैयक्तिक विभिन्नता विकसित होती है।

वैयक्तिक विभिन्नता के कारण

  • वंशानुक्रम
  • आयु व बुद्धि
  • लिंग-भेद
  • वातावरण
  • जाति-प्रजाति व राष्ट्र
  • पृष्ठभूमि
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा व आर्थिक स्तर
  • परिपक्वता

वैयक्तिक विभिन्नता के प्रकार-

1.सीखने में अन्तर       2.रूचि में अन्तर      3. स्वभाव में अन्तर

1.शारीरिक विकास में विभिन्नता
2. मानसिक विकास के विभिन्नता
3.सांवेगिक विकास में विभिन्नता
4.व्यक्तित्व सम्बन्धी विभिन्ता
5.उपलब्धियों में अन्तर
6.तानात्मक व क्रियात्मक क्षमताओं में अन्तर

वैयक्तिक विभिन्नता जानने की विधियाँ-

(1)  परीक्षण        (2) व्यक्ति इतिहास विधि        (3) सामूहिक अभिलेख

(A) बुद्धि परीक्षण                (B) उपलब्धि परीक्षण
(C) अभियोग्यता परीक्षण     (D) निदानात्मक परीक्षण
(E) अभिवृत्ति परीक्षण          (F) व्यक्तित्व परीक्षण
(G) अभिरुचि परीक्षण

वैयक्तिक विभिन्नता पर आधारित शिक्षण प्रक्रिया :

प्रणाली जन्मदाता विषतायेंशे
1. डाल्टन अमेरिकन शिक्षाशास्त्रिणी मिस हेलन पार्कहर्स्ट -समय सारणी नहीं।
-हर विषय की प्रयोगशाला।
-छात्र स्वतंत्र।
2. प्रोजेक्ट प्रणाली मूलाधार जॉन डीवी, परन्तु प्रणाली
के रूप में जन्मदाता विलियम हेड
किलपैट्रिक
-परिस्थिति उत्पन्न करना
-बालक को नवीन शिक्षा देना
-स्वयं सामाजिक वातावरण को पूरा करता है।
3. डेक्रोली डा. ओविड ड्रेकोली -जीवन के लिए जीवन द्वारा शिक्षा
-बालकों का विभाजन उनकी रुचि, क्षमता योग्यता
के अनुसार।
4. किण्डर गार्टन प्रणाली फ्रोबेल -पुस्तकीय ज्ञान का विरोध
-बाल-केन्द्रित प्रणाली
-खेल द्वारा शिक्षा
5. विनेटिका प्रणाली अमेरिका के डा. कार्लटन वाशबर्न -बालक के व्यक्तित्व को प्रधानता
-पाठ्यक्रम विभाजन
-छात्र अपनी गति से सीखकर स्वयं अपनी परीक्षा
लेता है।
6. माण्टेसरी प्रणाली जन्मदात्री डा. मेरिया माण्टेसरी -मनोवैज्ञानिक प्रणाली
-व्यवहारिक उपकरणों व सभी इन्द्रियों के माध्यम
से शिक्षा।
7 बेसिक शिक्षा प्रणाली मोहनदास कर्मचंद गांधी -सर्वागीण विकास पर बल
-अनिवार्य व निशुल्क शिक्षा
-हस्तकला पर आधारित मातृभाषा पर आधारित
8. गैरी शिक्षण प्रणाली डब्ल्यू ए. बर्ट तीन प्रमुख बातों पर बल, खेल, कार्य पर अध्ययन

 

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