Animal Behaviour And Communication

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Animal Behaviour And Communication

 

Animal Behaviour (जन्तु व्यवहार )

समस्त दिखने वाली चेष्टाओं, शरीर की स्थिति, इसका आकाशीय विन्यास, भावनाएँ, अभिव्यक्तियों स्वरोच्चारण, गन्धीय पदार्थों का स्रावण, रंग परिवर्तन, रोंगटों का खड़े होना (pilo-erection), आदि का पूर्णता से वैज्ञानिक अध्ययन व्यवहार कहलाता है। वास्तव में व्यवहार, उद्दीपन एवं प्रतिक्रिया का परिणाम है।

जन्तु व्यवहार का वैज्ञानिक, जैविक व विशिष्ट अध्ययन इथोलॉजी (Ethology) कहलाता है। इस शब्द का सही अर्थों में प्रयोग सन् 1950 में निको टिन्वर्जन (Niko Tinbergen) ने किया था। चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) को प्राणी व्यवहार के वैज्ञानिक अध्ययन का जनक कहा जाता है।

इन्होंने एक्सप्रेसन ऑफ इमोशन इन मैन एण्ड एनिमल (सन् 1872) नामक पुस्तक में प्राणी व्यवहार का जीवान्त वर्णन किया। वियना के जन्तु मनोवैज्ञानिक कोनरेड लॉरेन्ज (Konrad Loranz), हॉलैण्ड के प्राणीशास्त्री निको टिन्वर्जन (Niko Tinbergen) तथा जर्मनी के कार्ल वॉन फिश ने व्यवहारिकी को लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचाया। इनके उल्लेखनीय कार्य हेतु, इन्हें (सन् 1972-73) के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कोनरेड लॉरेन्ज (सन् 1903-89) को व्यवहारिकी का संस्थापक (founder of Ethology) माना जाता है।

व्यवहार के प्रारूप
(Prototype of Behaviour)

सामान्यतया प्राणियों में दो प्रकार का व्यवहार पाया जाता है; जैसे-स्वाभाविक या जन्मजात (innate) तथा सीखा गया व्यवहार (learned behaviour)| प्रत्येक जन्तु में विविध प्रकार के उद्दीपनों (stimuli) के अनुसार, प्रतिक्रियाएँ करने की मौलिक, जन्मजात (inborn) क्षमता होती है। इस मौलिक प्रतिक्रियाशीलता को जन्तुओं का स्वाभाविक व्यवहार (innate behaviour) कहते हैं। यह जीन्स (genes) द्वारा नियन्त्रित और आनुवंशिक (hereditary) होता है। व्यवहार में कोई परिवर्तन, जो अनुभव के परिणाम स्वरूप होता है। अधिगम (learning) या सीखा गया व्यवहार (learned behaviour) कहलाता है। इसमें जन्तु अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं में अनुभव के आधार पर परिवर्तन करता है।

रुढिबद्ध व्यवहार (Stereotyped Behaviour) 

जब कोई जन्तु किसी एक निर्दिष्ट प्रकार के उद्दीपन के लिए बार-बार समान प्रतिक्रिया करता है, इस प्रकार का व्यवहार रुदिबद्ध व्यवहार (stereotyped behaviour) कहलाता है। यह जन्मजात (innate) होता है। राजहंस (grey lag geese) द्वारा अण्डे लुदकाना रुदिबद्ध व्यवहार का

एक ऐसे व्यवहार, जो जीनों के द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं तथा जो अन्य सजातीय जन्तु को देखे या सीखे बिना ही प्रदर्शित होते हैं, नियत क्रिया प्रतिमान (Fixed Action Pattern-FAP) कहलाते हैं। सभी नियत क्रिया प्रतिमान जन्मजात तथा रुदिबद्ध होते हैं। रुदिबद्ध व्यवहार की प्रतिक्रियाओं को पाँच प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

1. गतिक्रम प्रतिक्रियाएँ (Kinesis Reaction)

किसी वातावरणीय दशा के उद्दीपन के कारण जन्तु में गमन (locomotion) होता है, परन्तु इसकी कोई निश्चित दिशा (direction) व दर (rate) नहीं होती। जन्तु की प्रतिक्रिया उद्दीपन की तीव्रता के अनुपात में बढ़ती है।

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डेन्ड्रोसीलम लैक्टियम प्रवणगतिक्रम (klinokinesis) तथा लेम्प्रेटा प्लेनेराई ऋजुगतिक्रम (orthokinesis) प्रदर्शित करते हैं।

2. अनुचलन प्रतिक्रियाएँ (Taxis Reaction)

उद्दीपन से प्रभावित होकर जन्तु में उद्दीपन स्रोत की दिशा में या उससे विपरीत दिशा की ओर निश्चित दिशात्मक गमन होता है। स्रोत की ओर गमन को सकारात्मक अनुचलन (positive taxis) तथा विपरीत दिशा में गमन को नकारात्मक अनुचलन (negative taxis) कहते हैं। उद्दीपनों तथा ग्राही अंगों (receptors) के सम्बन्धों के आधार पर अनुचलन निम्न प्रकार के हो सकते हैं

(a) द्रोपोटेक्सिस (Tropotaxis), जब जन्तु उद्दीपन को एक ही समय में दो या अधिक अंगों से ग्रहण करता है तथा सन्तुलित होकर उद्दीपन के स्रोत की ओर या विपरीत दिशा में गमन करता है।

(b) प्रतिअनुचलन (Telotaxis) इस क्रियाविधि में उद्दीपन ग्राही अंग पर एक निश्चित स्थान पर प्राप्त किया जाता है।
(c) अंशानुचलन (Menotaxis), इसमें जन्तु आपाती उद्दीपन से एक नियत कोण बनाकर एक नियत दिशा में गति करता है।

उद्दीपन स्रोत के आधार पर अनुचलन निम्न प्रकार का होता है

  • जलानुचलन (Hydrotaxis) जल के प्रति प्रतिक्रिया।
  • ताप अनुचलन (Thermotaxis) ताप के प्रति प्रतिक्रिया।
  • प्रकाशानुचलन (Phototaxis) प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया।
  • स्पर्शानुचलन (Thigmotaxis) स्पर्श के प्रति प्रतिक्रिया।
  • रसोनुचलन (Chemotaxis) रसायनों के प्रति प्रतिक्रिया।
  • विद्युत अनुचलन (Galvanotaxis) विद्युतीय क्षेत्र के प्रति प्रतिक्रिया।
  • गुरुत्यानुचलन (Geotaxis) गुरुत्व के प्रति प्रतिक्रिया।
  • धरानुचलन (Rheotaxis) जलधारा के प्रति प्रतिक्रिया।

3.प्रतिवर्ती प्रतिक्रियाएँ (Reflexes Reaction)

 

ये तन्त्रिकीय नियन्त्रण के अधीन अचेतन प्रतिक्रियाएँ होती है। ये स्पर्श, ताप, पीड़ा एवं विद्युत, आदि के अचानक उद्दीपन से अनायास यन्त्रवत् हो जाती हैं।

प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियन्त्रण मेरुरज्जु (spinal cord) के द्वारा होता है। तेज प्रकाश के सामने आँखों का बन्द हो जाना, किसी गर्म वस्तु पर हाथ पड़ने पर तुरन्त हाथ खींच लेना, आदि प्रतिवर्ती क्रियाओं के उदाहरण हैं।

4. अनुप्राणित प्रतिक्रियाएँ या मूल प्रवृत्तियाँ (Instincts Reaction)

ये सबसे जटिल और अत्यधिक स्थायी श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया होती हैं, इसीलिए इन्हें स्थायी क्रियानुकरण (FAP) भी कहते हैं। पक्षियों द्वारा घोंसला बनाना, देशान्तरण (migration), आवास का चयन, आदि अनुप्राणित प्रतिक्रियाएँ होती हैं। ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रसारित होती रहती हैं। चार्ल्स डार्विन के अनुसार, अनुप्रभावित प्रतिक्रिया या मूल प्रवृत्ति प्रतिवर्ती क्रियाओं की वंशागत होती है। जिनका प्राकृतिक चयन होता है तथा इसका अनुकूल व विकास भी होता है।

मूल प्रवृत्ति व्यवहार का कम जीवन अवधि वाले प्राणियों के जीवन में बहुत महत्त्व है, क्योंकि उनके पास सीखने का समय नहीं होता, अनेक प्राणी जो अकेले रहते हैं, उन्हें अन्य जीवों से सीखने का अवसर नहीं मिलता। उनके लिए भी यह आवश्यक है। रेत खोदने वाली बरे या ततैया (wasps) मूल प्रवृत्ति का एक अच्छा उदाहरण है। मादा बरें रेत में अनेक बिल खोदती हैं, जो ऊपर से संकरे व नीचे से चौड़ी होती हैं, इनमें यह कैटरपिलर को मारकर डाल देती हैं और उसके पास ही अण्डा देती है। अण्डे से निकलते लार्वे इन कैटरपिलर को खाकर वृद्धि करते हैं।

5. अभिप्रेरित प्रतिक्रियाएँ (Motivations Reaction)

ये शरीर की भीतरी दशाओं (conditions) द्वारा अभिप्रेरित होती है। ये किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक रूप से करनी होती हैं और उद्देश्य की प्राप्ति के बाद स्वतःसमाप्त हो जाती हैं। भूख तथा प्यास के उद्दीपन हमें मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस के नियन्त्रण में भोजन व जल प्राप्त करने के लिए विवश करते हैं तथा तृप्ति हो जाने पर प्रतिक्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं।

सीखा गया व्यवहार (Learned Behaviour)

अपनी प्रतिक्रियाओं में पूर्व अनुभवों के आधार पर, किंचित् परिवर्तन करने की प्रक्रिया को अधिगम या सीखना (learning) कहा जाता है। जन्तु इसे अपने जीवन काल में अर्जित करते हैं अर्थात् यह उपार्जित व्यवहार (acquired behaviour) होता है। इसमें होने वाले प्रतिक्रियाओं को पाँच प्रमुख श्रेणियों में बाँटा जा सकता है

1. अभ्यसन (Habituation)

इसमें किसी निर्दिष्ट उद्दीपन के बार-बार होने पर जन्तु की प्रतिक्रिया धीरे-धीरे कम हो जाती है। यह एक प्रकार का अनुकूली व्यवहार (adaptive behaviour) होता है।

2. अनुकूलित प्रतिक्षेप (Conditioned Reflex)

इसमें जन्तु की किसी क्रिया को प्रेरित करने वाले उद्दीपन के साथ किसी अन्य उद्दीपन का भी प्रशिक्षण दे दिया जाए, तो पहले उद्दीपन वाली प्रतिक्रिया दूसरे  उद्दीपन पर भी स्वतन्त्र रूप से होने लगती है। रुसी वैज्ञानिक पैवलोव (Pavlov. 1927) ने कुत्तों में इस प्रक्रिया को प्रदर्शित किया।

3. प्रयत्न व त्रुटि की सीख (Trial and Error Learning)

यदि जन्तु को एक ऐसा उद्दीपन दिया जाए, जो जन्तु के लिए लाभकारी है, तो यह इसके प्रति प्रतिक्रिया करता है, लेकिन यदि इसी उद्दीपन के समान एक हानिकारक उद्दीपन दिया जाए, तो जन्तु लाभकारी और हानिकारक उद्दीपनों के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं करता है। इसे प्रयत्न व त्रुटि की सीख कहते हैं।

4. प्रबोध तर्क (Insight Reasoning)

इसमें जन्तु पूर्व अनुभवों के बिना प्रबोध तर्क से किसी उद्दीपन के प्रति आवश्यक प्रतिक्रिया दर्शाते हैं।

5. अध्यंकन (Imprinting)

यह एक विशिष्ट प्रकार का सीखा हुआ व्यवहार होता है, जो एक बार स्थापित होने पर तुलनात्मक रूप से परिवर्तनों के प्रति प्रतिरोधी (अपरिवर्तनीय) होता है। के लॉरेन्ज (K Loranz; 1935) से बत्तख के चूजे पर इस प्रकार के व्यवहार को दर्शाया तथा इसे अध्यकन नाम दिया।

Communication Methods between Animals

(जन्तुओं के बीच संचार विधियाँ )

जन्तुओं में ऐसे संकेत उत्पन्न करने की क्षमता होती है, जो अन्य जन्तुओं में विशिष्ट प्रतिक्रियाएँ प्रेरित करने के लिए उद्दीपनों का कार्य करते हैं। जन्तुओं में संचार सामान्यतया एक ही जाति के विभिन्न जन्तुओं में पाया जाता है, क्योंकि आवास, भोजन तथा संगम साथी के लिए अधिकतम प्रतिस्पर्धा इन्हीं के बीच होती है। प्राणियों में संचार की प्रमुख विधियाँ इस प्रकार हैं

1. दृश्य संचार (Visual Communication)

यह सूचना तन्त्र सामान्यतया आर्थोपोडा, मोलस्का तथा कशेरुकियों में पाया जाता है, जिनमें नेत्र पूर्णतया विकसित होते हैं। शरीर की मुंगिकाओं (postures) तथा शरीर के भागों की विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ इनमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शरीर के निर्दिष्ट भागों की माप, आकृति व रंग अन्य जन्तुओं को सूचना प्रदान करते हैं।

2. ध्वनि संचार (Auditory Communication)

यह बड़े-बड़े क्षेत्रों और जल में संदेश भेजने में उपयोगी है। ध्वनि की लय, प्रतिरूप तथा तीव्रता से विभिन्न प्रकार के संदेश दिए जाते है। पक्षियों तथा स्तनियों में शत्रु के खतरों अथवा सम्भोग के लिए विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न करने की क्षमता होती हैं।

3. रासायनी संचार (Chemical Communication)

इसमें जन्तुओं के शरीर की सतह पर या मूत्र में ऐसे पदार्थ स्रावित होते हैं, जो जातीय सदस्यों में प्रतिक्रियाएँ प्रेरित करते हैं। इन पदार्थों को फीरोमोन्स (pheromones) कहा जाता है। फीरोमोन्स वाष्पशील (volatile) व गन्धयुक्त (odorous) पदार्थ होते हैं। इनका प्रभाव काफी बड़े क्षेत्रों में होता है। ये दो प्रकार के होते हैं

(i) निर्मोची फीरोमोन्स (Releaser pheromones) ग्राही के केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (CNS) को उद्दीप्त कर उसके व्यवहार में तुरन्त परिवर्तन लाते हैं, जिसे मोचक व्यवहार कहते हैं।

(ii) उत्कर्णी फीरोमोन्स (Primer pheromones) ग्राही में कार्यकीय क्रियाओं के समूह में परिवर्तन कर देते हैं। इसके बाद में किसी उपयुक्त उद्दीपन से किसी प्रकार का व्यवहार अभिव्यक्त होता है। रानी मधुमक्खी एक उत्कीर्ण फीरोमोन्स का स्रावण करती है, जो छत्ते की अन्य मादा मक्खियों के लैंगिक परिपक्व को रोक देता है।

4. स्पर्श संचार (Tactile Communication)

यह अनेक प्रकार के जन्तुओं में सामाजिक बन्धनों को प्रदर्शित करता है। अनेक जन्तुओं में नर व मादा के बीच प्रणय निवेदन (courtship) में इनका उपयोग होता है।

मानव की मूल प्रवृत्तियाँ एवं सम्बन्ध संवेग
(Basic instincts of human and associated behaviour momentum)

मूल प्रवृत्ति सम्बन्ध संवेग
भोजनान्वेषण
काम-प्रवृत्ति
शरणगति
हास्य
आत्महीनता
पुत्रकामना
संघ-प्रवृत्ति
संग्रह-वृत्ति
विधायकता
पलायन
निवृत्ति
जिज्ञासा
युयुत्सा
आत्म गौरव
क्षुधा
कामुकता
कष्ट
आमोद
अधीनता
वात्सलय
एकाकीपन
स्वामित्व की अनुभूति
कृति भाव
भय
घृणा
आश्चर्य
क्रोध
संकारात्मक आत्मानुभूति

 

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