Biology and Human Welfare

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Biology and Human Welfare

मानव कल्याण में जीव विज्ञान के सिद्धान्त
(Biological Theories in Human Welfare)

प्राचीन मानव को पशुपालन तथा पौधों को उगाने का ज्ञान नहीं था। उसका अधिकांश समय भोजन की खोज में ही व्यतीत हो जाता था। सम्भवतया वह गूदेदार फलों, सरल फली तथा जो जंगली शिकार पकड सकता था, उन्हें ही खाकर जीवित रहता था।

विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ, परन्तु स्थायी संस्कृति का विकास अपेक्षाकृत ऐसे शुष्क क्षेत्रों में हुआ जहाँ पर पानी भी समुचित मात्रा में उपलब्ध था। भारत में सिन्धु घाटी (Indus vally), मिस्र में नील (Nile) तथा एशिया में मेसोपोटामिया (Mesopotamia-टाइग्रिस तथा यूफ्रेटस नदियों के बीच) सभ्यताओं का विकास हुआ। इन क्षेत्रों में कृषि की तकनीक का विकास हुआ। इन क्षेत्रों की भूमि काफी उपजाऊ थी और नदियों की उपस्थिति के कारण पानी भी उपलब्ध था। इन क्षेत्रों में सभ्यताओं का विकास मूलतः खेती के कारण ही हुआ।

लिखित इतिहास से पूर्व ही अधिकांश खेती योग्य पौधों का उत्पादन तथा पालतू जानवरों का पालन शुरू हो चुका था। संचार तथा परिवहन साधनों का तब अभाव था। इसीलिए खेती योग्य पौधों के मूल निवास के क्षेत्रों के निकटवर्ती क्षेत्रों में ही खेती प्रचलित थी। उदाहरण के लिए, धान, नीबू, सेम तथा गन्ने की उत्पत्ति मलाया प्रायद्वीप में हुई। इनकी खेती विश्व के अन्य भागों में तब तक शुरू नहीं हुई, जब तक परिवहन की सुविधाएँ विकसित नहीं गईं। अनेक फल; जैसे-सेब, नाशपाती, आडू, आदि तथा अनाज; जैसे-गेहूँ, जौ, जई, आदि फारस व आसपास के क्षेत्रों से आए। गोभी, गांठगोभी, आदि भी मेसोपोटामिया में उगाए जाते थे।

नई दुनिया (new world) के क्षेत्रों में खेती की शुरूआत दक्षिणी एवं केन्द्रीय अमेरिका में अत्यन्त सीमित क्षेत्र में हुई। आलू, मक्का, लौकी, तम्बाकू टमाटर, अनन्नास, आदि की उत्पत्ति पेरू (Peru) में हुई। वैदिक साहित्य, रामायण तथा महाभारत के अध्ययन से पता चला है कि उन दिनों भारतवर्ष में खेती की व्यवस्था भली-भाँति विकसित थी। मोहनजोदड़ो की सभ्यता में खेती की शुरूआत के स्पष्ट संकेत मिलते हैं, जोकि वैदिक काल (2500 ई पू) तक काफी विकसित हो गई थी।

मोहनजोदड़ो सभ्यता के खण्डरों में गेहूँ और जौं के दाने मिले हैं। इससे स्पष्ट है कि उस समय इन अनाजों की खेती होती थी। प्राचीन भारत में हिन्दुओं को खजूर, कपास तथा अनेक फलों व सब्जियों का अच्छा ज्ञान था। वैदिक काल में पौधों का प्रवर्धन बीजों से, कलम से, कलियों, आदि द्वारा किया जाता था।

जन्तुओं से प्राप्त उपयोगी पदार्थ
(Useful Products from Animals)

जन्तुओं से अनेक प्रकार के उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं, जो निम्न प्रकार से हैं

खाद्य अथवा भोजन (Food)

जन्तुओं से प्राप्त निम्न पदार्थों का खाद्य के रूप में प्रयोग किया जाता है

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1. दूध तथा दूध उत्पाद (Milk and Milk Products)

गाय, भैंस, बकरी, आदि प्रायः हमें दूध देती है, जो शरीर के लिए पौष्टिक पदार्थ हैं। दूध में पानी, वसा, लैक्टोज, प्रोटीन, आदि पदार्थ होते हैं।

दुग्ध का व्यापार हमारे देश में लोग कच्चा दुग्ध (raw milk), उबला (boiled), निर्जर्मित (sterilised) (रोगाणु रहित), सुरूचिक (flavoured), सूखा मक्खन-रहित (dried skimmed) रूप में करते हैं। दुग्ध से यदि क्रीम निकाल दें, तब उसे टोन दुग्ध (toned milk) या म्वरक दुग्ध कहते हैं। संघनित दुग्ध (condensed milk) दुग्ध को उबालकर उसमें से जल दूर करने के पश्चात् सूखा दुग्ध पाउडर तैयार किया जाता है। दुग्ध का मन्थन करके क्रीम निकाली जाती है, जिसमें दुग्ध वसा-रहित हो जाता है।

दुग्ध से दही जमाने के लिए इसमें किण्व-कारक (fermenting agent) मिलाया जाता है। स्कन्दित दुग्ध (coagulated milk) में केसीन प्रोटीन (casein protein), वसा तथा जल होता है, इसे पनीर (cheese) कहते हैं।

क्रीम या दही का मंथन करने से मक्खन (butter) प्राप्त होता है। इसमें 90% से अधिक वसा होती है। मक्खन को गरम करने से घी (ghee) का निर्माण होता है। घी में 100 प्रतिशत वसा होती है। छैना तैयार करने के लिए दुग्ध में नींबू मिला कर उसे फाड़ना पड़ता है। इस प्रकार दुग्ध का स्कन्दन (coagulation) होता है। यदि हम दुग्ध को गरम करके उसमें से 50 प्रतिशत पानी निकाल दें, तब मावा या खोआ बनता है।

2. अण्डा (Egg)

अण्डे में संचित भोजन होता है, जिसे पीत या योक (yolk) कहते हैं। इसमें भी अनेक पोषक तत्व होते हैं। इसलिए यह पौष्टिक पदार्थ के अर्न्तगत ही रखा जाता है। अधिकांशतया कुक्कुट (बत्तख मुर्गी) के अण्डे ही भोजन के रूप में ग्रहण किए जाते हैं।

3. शहद (Honey)

यह मधुमक्खी (Apis) से प्राप्त होता है। यह एक रासायनिक यौगिक है, जिसमें साधारण शर्करा (simple sugar) होती है। यह मधुमक्खी के लार में उपस्थित एन्जाइम द्वारा मकरन्द की जटिल शर्करा पर प्रतिक्रिया से प्राप्त होती हैं। मधुमक्खी पुष्पों से मकरन्द एकत्रित करती है। मधुमक्खी एक सामाजिक प्राणी है। ये निवह में रहती है और अपना छत्ता बनाती है। इनमें श्रम-विभाजन पूर्ण विकसित होता है। एक निवह में तीन प्रकार की प्रावस्थाएँ होती है। इसलिए इन्हें बहुरूपी (polymorphic) भी कहते हैं।

औषधियाँ (Medicines)

जन्तुओं से अनेक प्रकार की औषधियाँ प्राप्त होती है। कैंथ्रीडीन तेल ब्लीस्टर बीटल (Blister Beetle) कीट से प्राप्त होता है। मछली का तेल मछलियों के शरीर से प्राप्त होता है। घोड़ों के रुधिर से ऐण्टिविनिम (antivenom) साँप काटने के इलाज के लिए तैयार की जाती है। पोलियो, खसरा, आदि रोगों की वैक्सिन भी जन्तुओं के रुधिर से तैयार की जाती हैं। विटामिन-A तथा D मछली के तेल से प्राप्त किए जाते हैं। पुराने समय में जोंक का प्रयोग अशुद्ध रुधिर चूसने के लिए किया जाता था। केंचुओं से पथरी, पीलिया, बवासीर, डायरिया, आदि रोगों के निदान के लिए औषधियों बनाई जाती है। मधुमक्खी के जहर से गठियाँ का इलाज होता था।

व्यापारिक महत्त्वपूर्ण पदार्थ
(Commercially Important Products)

  • सिल्क (silk) सिल्क मॉथ, बॉम्बिक्स मोरी (Bombyxmon) से सिल्क प्राप्त होती है। सिल्क वर्म को शहतूत के पेड़ों पर पाला जाता है।नर व मादा कीटों के बीच मैथुन से अण्डे पैदा होते हैं, जिनमें लार्वा उत्पन्न होते हैं। ये लार्वा अपनी लार ग्रंथियों से चिपचिपे तरल पदार्थ का स्रावण करता है, जो वायु में सूखकर लम्बे ठोस तन्तु में परिवर्तित हो जाता है।

यह तन्तु शरीर के ऊपर लिपटता जाता है और कृमिकोश नामक आवरण या कोश बन जाता है। इस अवस्था को प्यूपा या कोशित या कोशस्थ कहते हैं। एक पौण्ड सिल्क लगभग 25000 कोकूनों (cocoons) से प्राप्त होती है। सिल्क से साड़ियों तथा अन्य वस्त्र बनते हैं।

  • मोम (wax) मोम का उत्पादन मधुमक्खियों की मोम-ग्रन्थि से होता है। मधुमक्खी मोम का प्रयोग छत्ता बनाने में करती है। मधुमक्खियों 1 किलोग्राम मोम उत्पादन करने के लिए 10-20 किलोग्राम शहद का प्रयोग करती हैं। मोम का प्रयोग मोमबत्ती, पॉलिश, वार्निश, कागज, कार्बन पेपर, औषधियों, आदि में होता है।
  • लाख (Lac) यह मादा लाख कीट टेकार्डिका लक्का द्वारा उत्पन्न किया जाता है। यह कीट पीपल तथा बरगद के पेड़ों पर रहते हैं। मादा कीट चिपचिपा पदार्थ स्रावित करते हैं और अपने शरीर के चारों ओर आवरण बना लेते हैं। इसी के द्वारा ये पेड़ों की शाखाओं से चिपके रहते हैं। लाख का प्रयोग, आदि समय से किया जाता रहा है। पाण्डवों के लिए लाख का महल बनवाया गया था। आजकल इससे चूड़ी, कंगन, ग्रामोफोन के रिकॉर्ड, पॉलिश तथा बिजली का समान, आदि बनते हैं। यह स्पिरिट में घुलनशील होती है।
  • बीटी विष (Bt toxin) एक प्रकार का जीव विष है, जो एक जीवाणु जिसे बेसीलस थूरिन्जिएन्सिस (संक्षेप में बीटी) कहते हैं, से निर्मित होता है। बीटी जीव विष जीन जीवाणु से क्लोनिकृत होकर पौधों से अभिव्यक्त होकर कीटों (पीड़कों) के प्रति प्रतिरोधकता पैदा करता है, जिससे कीटनाशकों के उपयोग की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस तरह से जैव-पीड़कनाशकों का निर्माण होता है। उदाहरण-बीटी कपास, बीटी मक्का, बीटी धान, बीटी टमाटर, बीटी आलू एवं बीटी सोयाबीन, आदि।

आनुवंशिक इन्जीनियरिंग का महत्त्व
(Importance of Genetic Engineering)

आनुवंशिक इंजीनियरिंग के महत्त्व को निम्नांकित बिन्दुओं की सहायता से समझा जा सकता है
(i) इस तकनीक की सहायता से ऐसे जीवों को उत्पादित किया जा सकता है, जिनका जीन प्रारूप (genotype) बिल्कुल नया हो, जिससे कि आवश्यकतानुसार नये लक्षणों को उभारा जा सके।

(ii) कुछ मुख्य फसलों में नील-हरित शैवालों तथा जीवाणुओं से प्राप्त नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीन्स का स्थानान्तरण भी सम्भव हो गया है, जिससे ये फसले स्वयं ही अपनी आवश्यकतानुसार वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर सकती है इस प्रयास से यह सम्भव हो सकेगा कि फसलों की उपज बढ़ाई जा सके तथा मंहगे उर्वरकों की खपत को कम करके पैसा भी बचाया जा सके।

(iii) आजकल जीन थेरेपी का उपयोग करके कई रोगों को जड़ से खत्म करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

(iv) जेनेटिक इंजीनियरिंग से जीन की संरचना तथा उसकी भावाकृति को समझने में मदद मिलती है।

(v) पौधों की जंगली प्रजातियों से जीनों को प्राप्त करके उन्हें फसली पौधों में स्थानान्तरित कर उनमें कीड़े मकोड़े तथा परजीवियों के प्रति प्रतिरोधकता पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

(vi) इस तकनीक की सहायता से पौधों में स्वतः रोग प्रतिरोधकता उत्पन्न करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

(vii) हरितलवक एवं केन्द्रिकीय जीन्स को पुनः समायोजित (reassemble) कर फसली पौधों की प्रकाश-संश्लेषण करने की क्षमता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

(viii) कुछ ऐसी कोशिकाओं के उत्पादन के प्रयास किए जा रहे हैं, जो बायोरिएक्टर्स पोषक खाद्यों का उत्पादन कर सकें।

क्लोनिंग (Cloning)

यह विधि सबसे अधिक सरल तथा उपयोगी सिद्ध हुई है, आप जानते हैं। कि कोशिकाओं में DNA का प्रतिकृतिकरण होता है, परन्तु यह भी तभी होता है, जब स्वयं जीन इसका आदेश देता है। कोशिका में इन ‘प्रतिकृतिकरण जीनों की संख्या बहुत कम होती है; जैसे-कुछ जीवाणुओं के गुणसूत्र में 300-500 तक जीन होते हैं, परन्तु ‘प्रतिकृतिकरण जीन’ केवल एक ही होता है।

इस जीन की एक विशेषता यह भी है कि यदि इसे मूल DNA से अलग करके किसी दूसरे DNA के साथ जोड़ दिया जाए तो यह उसकी प्रतिकृति करने लगता है। जीवाणुओं के प्लाज्मिड में भी यह जीन उपस्थित होता है। यही कारण है कि जिन जीवाणु कोशिकाओं में प्लाज्मिड होता है वे तेजी से गुणन करती हैं।

शरीर में प्रत्येक पदार्थ के संश्लेषण के लिए कोई निश्चित जीन उत्तरदायी होता है। यदि इस विशिष्ट जीन को प्लाज्मिड के साथ पहले बताई गई विधियों द्वारा संकरित किया जाए और इस संकरित DNA को पुनः जीवाणु की कोशिका में स्थापित करके उपयुक्त संवर्धन माध्यम में उगने दिया जाए, तो जीवाणु में वह जीन उसी-पदार्थ का संश्लेषण करता है, जोकि वह मूल शरीर में करता था। इस समस्त प्रक्रिया को क्लोनिंग कहते हैं। पोषी जीवाणु के लिए ई.कोलाई का उपयोग किया जाता है।

क्लोनिंग द्वारा ही सर्वप्रथम इन्सुलिन को (सन् 1892) में प्राप्त किया गया, जो बाजार में ‘ह्यूमिलिन’ के नाम से उपलब्ध है।

जीन लाइब्रेरी (Gene Library)

उपरोक्त विधियों से किसी जीवधारी के सम्पूर्ण जीनोम को अनेक जीनों में खण्डित करके उन्हें उपयुक्त जीवाणु, कीट, जन्तु अथवा पादप कोशिका में क्लोन किया जा सकता है। किसी जीवधारी के समस्त जीनों के इस प्रकार प्राप्त क्लोनों को उस जीवधारी की जीन लाइब्रेरी कहते हैं।

स्टेम सेल (Stem Cell)

स्टेम सेल शरीर के कोशिका, ऊतक और प्रत्येक अंगों के आधार कोशिका होते हैं। वे एक रिक्त माइक्रोचिप की भाँति होते हैं, जिसमें कितने भी विशेषीकृत कार्यों के लिए कार्यक्रम डाला जा सकता है, जो उचित वातावरण में विशेषीकृत ऊतक एवं अंगों के रूप में विकसित किए जा सकते हैं अर्थात् उनमें शरीर के किसी भी अंग की कोशिका के रूप में विकसित होने की क्षमता पाई जाती है।

ये पूर्वगासी गैर विशेषीकृत अविभाज्य कोशिका होते हैं, जो स्वप्रसरण प्रवासन और विभेदीकरण (differentiation) में सक्षम है।

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