Reproductive and Social Behaviour in Animals

Reproductive and Social Behaviour in Animals

किसी भी जाति का किसी भी आवास में अस्तित्व उसकी पोषण प्राप्ति तथा स्वयं का अन्य परभक्षियों से बचाव पर निर्भर करता है। पोषण प्राप्ति के पश्चात् उस जीव का इस पृथ्वी पर अस्तित्व उसकी जनन क्षमता द्वारा निर्धारित किया जाता है। किसी जीव की जनन क्षमता तथा स्वयं की जाति को शाश्वत रखने की योग्यता, उस जीव का अदभुत व अद्वितीय लक्षण है। कोई भी जीव इस अद्वितीय लक्षण (प्रजनन) के द्वारा ही अपनी जाति के युवा जीव उत्पन्न करके जीन को एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में स्थानान्तरित करता है।

किसी भी पारिस्थितिक तन्त्र में उसके सजीव घटकों (जन्तु, एवं पौधों) तथा अजैविक घटक; जैसे-पारिस्थितिकीय कारक में सदैव अन्तः क्रियाएँ होती रहती हैं। ये पारस्परिक अन्तःक्रियाएँ जैविक व अजैविक घटकों के साथ-साथ, उस पर्यावरण के जैविक घटकों के मध्य विभिन्न जातियों के मध्य तथा एक ही जाति के विभिन्न सदस्यों के मध्य निरन्तर होती रहती हैं। ये अन्तः क्रियाएँ जन्तुओं में पारस्परिक सम्पर्क, संचार, लैंगिक व्यवहार तथा सामाजिक व्यवहार का निर्धारण करती हैं।

Interactions between Animals

(जन्तुओं के बीच अन्तःक्रियाएँ )

जन्तुओं में एक ही जाति के विभिन्न सदस्यों के बीच अन्तःजातीय (intraspecific) तथा विभिन्न जाति के सदस्यों के बीच अन्तर्जातीय (interspecific) अन्तक्रियाएँ होती हैं।

1.Intraspecific Interaction (अन्तःजातीय अन्तक्रियाएँ )

सामाजिक अन्तः क्रियाएँ कुछ प्रतियोगी (competitive) व अन्य सहयोगी (cooperative) होती हैं। अक्रामकता (aggressiveness), प्रभाविता (dominance) तथा क्षेत्रीयता (territoriality) महत्त्वपूर्ण अन्तःजातीय प्रतियोगी अन्तः क्रियाएँ होती हैं। ये मुख्यतया आवास, भोजन व प्रजनन में प्रयोग होती हैं। अन्तःजातीय अन्तःक्रियाओं में सहयोगी अन्तः क्रियाएँ मुख्यतया प्रजनन (reproduction) से सम्बन्धित होती हैं। सम्भोग से पहले प्रणय-निवेदन (courtship) इसका एक उदाहरण है।

कुछ सहयोगी अन्तःक्रियाएँ निम्न प्रकार की होती हैं

(i) झुण्ड निर्माण (Herd formation) सामान्यतया जन्तु अपनी सुरक्षा भोजन, जल एवं निवास स्थान, आदि हेतु झुण्ड बनाकर रहते हैं। जैसे-हाथी, गीदड़, बन्दर, भेड़, आदि। प्रत्येक झुण्ड में एक नेता होता है।

(ii) परिवार निर्माण (Family formation) मैथुन एवं प्रजनन के पश्चात् नर तथा मादा अपने शिशुओं के साथ एक ही स्थान पर रहते हैं। इसे परिवार कहते हैं।

(iii) मैथुन (Mating) इसमें नर तथा मादा जीव, पारस्परिक सहयोग से प्रजनन करने में समर्थ होते हैं। इनकी सन्तान की देख-भाल भी नर अथवा मादा द्वारा की जाती है।

(iv) समाज निर्माण (Society formation) मनुष्य तथा सामाजिक कीट समाज बनाकर ही रहते हैं। प्रत्येक समाज के जीवों में श्रम विभाजन (division of labour) होता है अर्थात् इनमें कुछ जीव एक कार्य करते हैं और अन् दूसरा कार्य करते हैं।

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(v) प्रादेशिकता (Territory formation) प्रदेश निर्माण भी जन्तुओं में प्रायः पाया जाता है। प्रदेश निर्माण निवास स्थान, भोजन तथा प्रजनन हेतु होता है। इसमें जन्तु पारस्परिक सहयोग से एक विशिष्ट स्थान को अपना प्रदेश बना लेते हैं, इसमें बाहर से अन्य जन्तुओं को नहीं आने देते। इन प्रदेशों की पूर्णतया रक्षा की जाती है।

2.Interspecific Interaction (अन्तर्जातीय अन्तः क्रियाएँ )

एक ही क्षेत्र में वास करने वाली विभिन्न जातियों के सदस्यों के बीच अन्तर्जातीय अन्तः क्रियाएँ पाई जाती हैं।

समान आवश्यकता रखने वाली जातियों के सदस्यों के बीच प्रतियोगी (competitive) तथा असमान आवश्यकता रखने वाली जातियों के सदस्यों के बीच सह अस्तित्व (coexistence) की अन्तःक्रियाएँ पाई जाती है।

ये सम्बन्ध निम्न प्रकार के हो सकते हैं

  • दो जातियों के बीच ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध, जिससे दोनों लाभान्वित हों, सहजीविता (symbiosis) कहलाता है।
  • प्रतियोगी अन्तःक्रियाओं में परभक्षण (predation) तथा परजीविता (parasitism) प्रमुख होती है।

Courtship in Animals (जन्तुओं में प्रणय निवेदन )

प्राणियों में प्रणय निवेदन एवं उसके प्रदर्शन ने मानव को सदैव एक कौतूहल व आकर्षक विषय प्रदान किया है। विशेषकर एक समान जाति के प्राणियों में पारस्परिक अन्तःक्रिया प्रजनन से सम्बन्धित होती है। प्रणय निवेदन के अन्तर्गत नर मादा को विभिन्न प्रकार से मैथुन क्रिया के लिए आकृषित करता है।

प्रणय निवेदन या अनुरंजन समान जाति के दो विपरीत लिंगों जन्तुओं को करीब लाने में सहायक होता है, जिसके अन्तर्गत संचारीय साधन (communicative methods) संकेतों का एक जटिल क्रम होता है, ताकि उचित उपयुक्त साथी के साथ संगम किया जा सके। यह जन्तुओं में सामाजिक व्यवहार को इंगित करता है। मैथुन से पूर्व होने वाले इस जनन व्यवहार का प्राथमिक कार्य स्वयं की जाति तथा वांछित लिंग की पहचान है; जैसे-नर सिचिलिड (cichilid) साथी मादा को जल पर पूँछ को बार-बार मारकर आकृषित करते हैं।

प्रणय निवेदन के महत्त्वपूर्ण, उदाहरण-तीन कटॅकी पीठ युक्त (threespined stickle back) गेस्ट्रोस्टीयस एक्यूलिएटस, टिलापिया मछलियों द्वारा तथा प्रेलिग तितली द्वारा प्रदर्शित किए जाते हैं। सफल प्रणय निवेदन के लिए प्राणी का एक ही जाति से सम्बन्धित होना, मिलन की तीव्र इच्छा, सामाजिक उत्तरदायित्व, सन्तति की देखभाल तथा विपरीत लिंगों का होना मूलाधार लक्षण है।

Characteristics of Courtship

( अनुरंजन या प्रणय निवेदन की विशेषताएँ )

जन्तुओं प्रणय के समय कुछ विशिष्ट प्रकार के प्रदर्शनों द्वारा साथी को आकृषित करते हैं तथा अपनी जाति के विपरीत लिंगों को जोड़ा बनाने की सहमति प्रदान करते हैं। अनेक जातियों के जन्तुओं में पाए जाने वाले कुछ विशेष लक्षण सम्भावित जोड़ीदार को बहुत दूर से आकृषित करने के लिए अनुकूलित होते हैं ये विशेषताएँ प्रदर्शन, दृश्य श्रव्य, पेश तथा घाण संवेदी होते हैं।

1.Light (प्रकाश )

विभिन्न प्रकार की प्रजाति के जीव विपरीत लिंग के जीवों को प्रकाश उत्सर्जित करके आकर्षित करते हैं। उदाहरण-साइलिडि (Syllidae) गण सदस्या जुगनू उड़ते समय प्रकाश के उत्सर्जन द्वारा संकेत देता है, जबकि वनस्पतियों में बैठी मादा अपनी जाति के नर के संकेत को पहचान कर अपनी विशिष्ट चमक का संकेत देती है। अनेक गहरे समुद्र की मछलियाँ; जैसे-लालटेन मछली तथा मिक्टोफोएडी तथा एनोमेलपिडी के सदस्य भी अपने जीवन साथी से प्रणय निवेदन हेतु प्रकाश की चमक छोड़ते हैं।

2. Ficturd (चाक्षुस या दृश्य )

पंखों का फड़फड़ाना, उपागों (antennae) का लहराना, रंगों की व्यवस्था तथा प्रकाश को उत्पन्न करना दृश्य प्रदर्शन के अन्तर्गत आता है।

3.Sound (ध्वनि )

कुछ अकशेरुकी अपने पंखों को फड़फड़ा कर ध्वनि को उत्पन्न करते हैं। कुछ उपागों को रगड़कर तथा कशेरुकी जन्तु स्वर यन्त्र के द्वारा ध्वनि को उत्पन्न करके प्रणय प्रदर्शन करते हैं।

4.Tactile (स्पर्श )

स्पर्श प्रणय व सहवास में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। प्रणय कर रहे जन्तुओं द्वारा पारस्परिक शरीर रगड़ना, धकेलना, कुण्डली मारना, चाटना, गले मिलना, सामान्यतया देखा जाता है। हाथी प्रणय के समय स्पर्श संकेतों का प्रयोग करते हैं। सूण्ड इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मादा का पीछा करने के बाद नर उसके सिर, सूण्ड को दुलारता है और उसकी पीठ की ओर से धकेलता है यह प्रक्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि वह सहवास के लिए तैयार नहीं हो जाती।

5. Olfactory Communication ( घाण सम्प्रेषण )

घाण सम्प्रेषण के अन्तर्गत जन्तु एक-दूसरे को रासायनिक सन्देशवाहकों से सन्देश देते हैं जिन्हें फीरोमोन कहते हैं, ये विशिष्ट ग्रन्थियों से स्रावित किए जाते हैं। घ्राण संकेतन स्तनियों के लैंगिक व्यवहार में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा कीटों, विशेषकर पतंगों में जीवन साथी को ढूंढने का अत्यन्त विकसित तन्त्र है। उदाहरण-मादा रेशम कीट अपने उदर की ग्रन्थियों से एक वाष्पशील स्राव उत्पन्न करती है, जिसे बाम्बिकोल कहा जाता है तथा इसे अपने पंख फड़फड़ाकर हवा में फैला देती है, जो नर कीट द्वारा सात मील दूर से भी पहचान लिया जाता है। नरों की शृंगिकाएँ इन्हें ग्रहण करने के लिए अत्यन्त विकसित एवं बड़ी होती है।

रानी मधुमक्खी एवं दीमक द्वारा मोचित किए गए फीरोमोन नरों को कामद उड़ान के लिए आकृषित करते हैं।

विशालकाय सो; जैसे-बोआ कन्स्ट्रिक्टर, अजगर एवं एनाकोण्डा में नर मादा को उसके गुदीय ग्रन्थियों (anal glands) से स्रावित स्राव के आधार पर पहचानते हैं।

नर हाथी अपने सिर की आर्बिटल ग्रन्थियों से एक दूधिया पदार्थ का सावण करता है, कुत्ते मदकाल (heat) में आई मादा द्वारा छोड़ी गई विशेष गन्ध से उसका पीछा करते हैं।

Migratory Behaviour in Fishes and Birds

(मछली एवं पक्षियों में प्रवासी व्यवहार)

मछली तथा पक्षियों में प्रवासी व्यवहार भी प्रजनन से सम्बन्धित होता है। जन्तुओं का एक स्थान से दूसरे स्थान को नियतकालिक भ्रमण, प्रवास (migration) कहलाता है।

Migration in Birds (पक्षियों में प्रवास )

पक्षियों का एक स्थान से दूसरे स्थान को नियतकालिक भ्रमण, प्रवास कहलाता है। पक्षी प्रवास एक द्विपक्ष यात्रा (two-way journey) होती है। पक्षियों में प्रवास एक नैसर्गिक (instinct) अभिक्रिया है। भोजन का अभाव, दिन के प्रकाश का घटना तथा शीत की उत्तरोत्तर वृद्धि होना इसके मुख्य कारण है। प्रवास लैंगिक चक्र (sexual cycle) का एक भाग है।

विलियम रौवेन के अनुसार, दीप्तिकाल (photoperiod) जनन ग्रन्थियों के परिवर्धन को प्रभावित करता है। जनदों के फूलने से पक्षी उत्तर दिशा की और गमन करते हैं तथा जनन स्थलों पर पहुँचकर जनन करते हैं।

पक्षियों के प्रवास के अध्ययन दूरबीन या टेलीस्कोप और रेडार के प्रयोग से करते हैं।

प्रवासों के अध्ययन की एक महत्त्वपूर्ण विधि वलयन (ringing) तथा पट्टाभन (banding) है। इसका प्रयोग सर्वप्रथम डेनमार्क के पक्षी विज्ञानी एच सी सी मार्टेन्सन (HCC Martensen) ने 1899 में किया था।

Migration in Fishes (मछलियों में प्रवास)

मछलियों स्तु या मौसमी प्रवास (seasonal migration) करती है। प्रवासी मछलियाँ मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं

(i) Diadromous Fishes (उभयत्रगामी मछलियाँ )

ये मछलियों समुद्र व स्वच्छ जल के बीच प्रवास करती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं-
(a) वे मछलियों, जो प्रजनन के लिए समुद्र से स्वच्छ जल की ओर प्रवास करती हैं, समुद्रापगामी मछलियाँ (anadromous fishes) कहलाती है। उदाहरण-साल्मोन, हिल्सा।
(b) वे मछलियों, जो स्वच्छ जल से समुद्र की ओर प्रवास करती है, समुद्राभिगामी मछलियाँ (catadromous fishes) मछलियों कहलाती हैं। उदाहरण-अमेरिकी ईल

(c) वे मछलियाँ, जो समुद्र से स्वच्छ जल की ओर तथा स्वच्छ जल से समुद्र अर्थात् दोनों दिशाओं में प्रवास करती हैं, उभयगामी मछलियाँ (amphidromous fishes) कहलाती हैं। उदाहरण-गोबीज।

(ii) Potamodromous Fishes (सरितगामी मछलियाँ )

ये मछलियाँ सिर्फ नदियों में रहती हैं और वहीं प्रवास करती हैं। उदाहरण-कार्प, ट्राउट।

(iii) Oceanodromous Fishes (समुद्रगामी मछलियाँ )

ये समुद्र में रहती हैं तथा वहीं प्रवास करती हैं। उदाहरण-अटलाण्टिक हेरिंग, सारडाइन्स।

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